Friday, May 6, 2011

संवेदनशून्य संसार

तुम मुस्कुराते हो .
देख मेरा सूनापन,         
बोझिल सा ये जीवन, 
मंद मंद गाते हो ? 
काँटों के रस्तों में ,
कंकड़ पत्थर पथ में, 
घावों से लथपथ हो, 
चलती हूँ मैं हठ से .
देख मेरी दीन दशा,
कितना इतराते हो !  
तुम मुस्कुराते हो .
कदम कदम मुश्किल है .
उलझा सा हर पल है. 
पंथ सूझता नहीं ,
आगे गहरा तम है .
साथ तो देते नहीं ;
पर ठहाके लगाते हो !
तुम मुस्कुराते हो .
चलना है बोझ लिए; 
मुश्किल है कौन जिए ;
जीना तो फिर भी है; 
संकट को साथ लिए. 
देख मेरी दुर्दशा ,
तुम गुनगुनाते हो !       
तुम मुस्कुराते हो .
आहों में दर्द लिए ;
पीड़ा के घूँट पिए ;
सागर भर देती हूँ ,
आंसू में जहर लिए . 
उत्पीडन देख देख,      
बांछे खिलाते हो !
तुम मुस्कुराते हो.
पीड़ा से कातर हो,
टूट टूट जाती हूँ.
बेबस हो  तब दुःख से,
आँचल फैलाती हूँ.
कनखी से मुझे देख ,
आँख तुम चुराते हो !
चुपके से बच बच के,   
दूर चले जाते हो !
गायब हो जाते हो !!



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