Thursday, July 14, 2011

परछाई मत पकड़ो




परछाई मत पकड़ो
हाथ नहीं आएगी 
लम्बी खिंच जायेगी 
प्रकाश के पुंज की
धारा को देख लो 
दिशा पहचान लो 
काम वही आएगी 
बढ़ चलो किरणों संग 
मार्ग दर्शायेंगी 
स्रोत तक लाएँगी
किरणें वहाँ रूकती हैं 
बाधा जहाँ दिखती है 
बाधा के पृष्ठतल में 
छाया का वास है 
भ्रम का आभास है 
लुभावनी छलना है 
क्यों उसे पकड़ना है ?
हाथ नहीं आएगी 
लक्ष्य से हटाएगी 
पथ भ्रमित कर देगी 
निराशा से भर देगी 
इसीलिए ठहर जाओ 
परछाई मत पकड़ो 
आशा को साथी चुन 
किरणों के जाल तले 
स्रोत की दिशा पकडे 
जब तक अस्तित्व है 
मंथन करते मन से 
चलते ही जाना है 
छाया से उलझने पर 
बाधा ही आएँगी 
ज्ञान का प्रकाश पुंज 
विलुप्त हो जाएगा 
तम शेष रहने पर 
परछाई भी न होगी 
श्रेष्ठ होगा यही 
छाया के घेरों का 
व्यूह भेद कर सत्वर 
ज्ञान की उज्ज्वलता में 
समर्पित चेतना को 
लक्ष्य तक पहुँचाओ
परछाई छोड़ परे
सूर्य के निकट आओ  

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