Saturday, October 18, 2014

नन्हें ऋषि! सो जा !!




















गर्दन और ठोड़ी के बीच ,
नन्हा सा मुख दुबचाए ,
तीव्र गति से श्वासों को ,
समेटता बिखेरता शिशु ,      
अचानक नन्हीं गर्दन उचकाता है ।
आँख बंद किए नन्हा मुख खोले ,
दुग्धपान की आशा से ,
वह मेरे गले पर,
कोमल ओष्ठ का,
मृदु प्रहार करता है ।
फिर गर्दन उठाकर,
पुन: प्रयत्न करता है ।
कुछ न पाने पर ,
व्याकुल हो उठता है ।
ऊँ - आँ ; ऊँ - आँ की ध्वनि ,
गुंजरित हो जाती है ।
मेरा विचलित मन,
पुकार उठता है ;
"ओ नन्हें शिशु !
तनिक रुको तो !
शीघ्र ही मधुर दुग्ध ,
तुम्हारे मुख में आएगा ।
थोड़ा ठहरो न ,
 धैर्य तो धरो !
अच्छा तो, तुम्हें सहला देती हूँ ।
लो प्यारी कोमल थपकियाँ भी दूँगी ।
अरे, लोरी भी सुनाऊँ क्या ?
देखो ! नन्हें खगशावक जैसी,
नन्हीं सी चोंच बंद करो।
मेरी गोद में आ जाओ।
होले-होले, हिलते-डुलते ,
मम्मा के आने तक,
चुपके से सो जाओ।"

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